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लौह भस्म के फायदे ,गुण और उपयोग:-

1- लौह भस्म-पाण्डु, रक्त -विकार, उन्माद, धातु- दौर्बल्य,संग्रहणी, मंदाग्नि, प्रदर, मेदोवृद्धि, कृमि, कुष्ठ, उदर रोग, आमविकार, क्षय, ज्वर, हृदयरोग, बवासीर, रक्तपित्त, अम्लपित्त, शोथ आदि अनेक रोगों में अत्यन्त गुणदायक है।
2- यह रसायन और बाजीकरण है। लौह भस्म मनुष्य की कमजोरी दूर कर शरीर को हृष्ट-पुष्ट बना देती है। भारतीय रसायनों में लौह भस्म का प्रयोग सबसे प्रधान है। यह रक्त को बढ़ाने और शुद्ध करने के लिए सर्व प्रसिद्ध औषध है।
3-हमारे प्राचीन वैद्यक ग्रंथों में और आधुनिक (आजकल के) अंग्रेजी वैद्यक में प्रायः सब रोगों | की औषध योजना में लौह का उपयोग किया जाता है। अनुपान की भिन्नता से यह सब रोगों को नाश करती है। फिर भी कफयुक्त खाँसी, दमा, जीर्ण-ज्वर और पाचन-क्रिया बिगड़ने से उत्पन्न हुई मंदाग्नि, | अरुचि, मलबद्धता, कृमि आदि रोगों में यह विशेष फायदा करती है। पौष्टिक, शक्तिवर्द्धक, कान्तिदायक और कामोत्तेजक आदि गुण भी इसमें विशेष रूप से है।
4- लौह भस्म किसी भी प्रकार का हो, सेवन करने से पूर्व यदि दस्त साफ आता हो, तो अच्छा है, नहीं तो इस भस्म के सेवन-काल में रात को सोते समय त्रिफला चूर्ण में मिश्री मिला कर दूध के साथ सेवन करें। इससे दस्त साफ होता रहता है, और इसकी गर्मी भी नहीं बढ़ने पाती क्योंकि अक्सर देखा जाता है कि लौह भस्म के सेवन-काल में दस्त कब्ज हो जाता है, जिससे गर्मी भी बढ़ जाती है। इसी को दूर करने के लिए त्रिफला और दूध का सेवन किया जाता है।
5- लौह भस्म रक्ताणुवर्द्धक और पाण्डुरोगनाशक है। पाण्डु चाहे किसी भी कारण से उत्पन्न हुआ हो, रक्ताणुओं की कमी होकर श्वेत कणों की वृद्धि हो जाना ही “पाण्डू रोग” कहलाता है। कभी-कभी ऐसा भी हो जाता है कि कुछ रोज तक शरीर के उपरी भाग में फीकापन दिखाई पड़ता है, और बाद में पुनः लाली छा जाती है, किंतु यह वास्तविक पाण्डु रोग नहीं है। वास्तविक पाण्डु रोग तो वही है, जिसमें श्वेत-कणों के प्रभाव से शरीर पर बराबर फीकापन बना रहे चमडी रूक्ष (सूखी ) हो जाय, रंजक पित्त | (जिसके द्वारा रक्त में लाली बनी रहती है ) का नाश हो जाय, इत्यादि लक्षण होने पर पाण्डु रोग समझना चाहिए और ऐसे पाण्डु रोग में लौह भस्म से बहुत फायदा होता है।

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Weight 0.250 kg

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