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मण्डूर भस्म के फायदे :-

✦ यकृत (Liver) की खराबी : मण्डूर का प्रभाव यकृत पर होता है। अतएव यकृत की खराबी से होनेवाले पाण्डु रोग, मन्दाग्नि, कामला, बवासीर, शरीर की सूजन, रक्तविकार आदि रोगों में विशेष रूप से काम करता है।
✦ पाण्डु रोग : पाण्डु रोग में जब किसी औषध से लाभ न हो, तब मण्डूर भस्म गिलोय (गुर्च) के रस अथवा पुनर्नवा के रस के साथ प्रयोग करने से आशातीत लाभ होता है।
✦ उदर रोग : इसके अतिरिक्त उदर रोग में अच्छा काम करता है।
✦ इसकी भस्म सौम्य, शीतल और कषाय गुणवाली है। जो गुण लौह भस्म में है उससे कुछ ही कम गुण मण्डूर भस्म में पाया जाता है।
✦ मण्डूर भस्म लौह भस्म की अपेक्षा शरीर पर जल्दी असर करती है, क्योंकि यह लौह भस्म से सूक्ष्म होती है। अतएव, बच्चों, गर्भवती स्त्रियों एवं कामल प्रकृतिवालों के लिए लौह भस्म की अपेक्षा मण्डूर भस्म का प्रयोग करना अधिक श्रेयस्कर है।
✦ मण्डूर भस्म या लौह भस्म रंजक-पित्त को सुधार करके रक्ताणुओं को बढ़ाती है। अतएव, रक्ताणुओं की कमी से होनेवाले रोग इससे नष्ट होते हैं।
✦ लौहकिट्ट मण्डूर के किट्ट अवस्था में खुली जमीन पर सैकड़ों वर्ष पड़े रहने के कारण वर्षा तथा वायु के संयोग से उस पर ओषजन बहुत जम जाती है, रक्ताणुओं की वृद्धि करने के लिए उत्तम लाभकारी वस्तु है। इसी कारण करने में मण्डूर भस्म सर्वाधिक उपयोगी सिद्ध हुई है।
✦ खून की कमी : मण्डूर भस्म का प्रधान कार्य रक्ताणुओं की वृद्धि करना है। किसी भी कारण से रक्ताणुओं की कमी होने पर मण्डूर भस्म का प्रयोग करना बहुत लाभदायक है।
✦ पाण्डू रोग(पीलिया) : प्रथम अवस्था पाण्डू रोग में रक्ताणुओं की कमी – के कारण हृदय कमजोर हो जाता है और उसकी गति बढ़ जाती है। हृदय की गति बढ़ जाने से रक्तचाप एवं नाडी की गति में भी वृद्धि हो जाती है, क्योंकि शरीर में रक्ताणुओं की जितनी कमी होगी उतनी ही शारीरिक अवयवों में भी कमजोरी होती जायेगी। इन विकारों को दूर करने के लिये रक्ताणुओं की वृध्दि करनी चाहिए। रक्ताणुओं की वृदि के लिए ही मण्डूर भस्म का प्रयोग किया जाता है। यह रंजक पित्त को सबल बनाकर उसकी सहायता से शरीर में रक्ताणुओं की वृध्दि करने में समर्थ होता है। रक्ताणुओं की वृद्धि होने से शरीरावयव पुष्ट हो जाते हैं तथा हृदय की गति भी अपनी सीमा पर नाडी की गति को भी उचित अवस्था पर ले आती है तथा शरीर में पाण्डुता भी कम हो जाती है। इसी कारण पाण्डु रोग की औषधियों में प्रायः मण्डूर और लौह का मिश्रण रहता है।
✦ पाण्डुरोग की ही दूसरी अवस्था कामला है। इसकी उत्पत्ति के विषय में लिखा है कि जो पाण्डुरोगी पैत्तिक पदार्थों का ज्यादा सेवन करते हैं, उनका पित्त प्रकुपित (दुष्ट) होकर रक्त और मांस को दूषित करके कामला नामक रोग उत्पन्न कर देता है। इसमें आँख, मुँह, नाखून सब पीले हो जाते हैं। मूत्र पीला होना, मल काले (मटमैले) रंग का होना, शरीर में दाह, अन्न में अरुचि आदि लक्षण होते हैं। इस रोग में भी मण्डूर भस्म बहुत फायदा करती है, क्योंकि मण्डूर भस्म शीतल है। अत: पैत्तिक रोगों में इसका असर बहुत शीघ्र होता है और इस रोग का प्रधान कारण पित्त की विकृति ही है। इसलिए निर्भय होकर इसका प्रयोग सुवर्ण माक्षिक भस्म के साथ करें। ऊपर से कुमार्यासव का भी सेवन कराने से आशातीत लाभ होता है।
✦ पाण्डु रोग की तीसरी अवस्था कुम्भकामला है। अर्थात् जब कामला रोग पुराना हो जाता है, तो दोष कोष्ठाश्रय होकर कुम्भकामला को उत्पन्न करता है। यह असाध्यावस्था है। इसमें रक्ताणुओं की कमी होते-होते शरीर में जल भाग विशेष हो जाता है, जिससे सम्पूर्ण देह में सूजन हो जाती है, विशेष कर नेत्र, पेट, गाल और हाथ-पैर के ऊपरी भाग में यह सूजन ज्यादा होती है। इस सूजन को दबाने से गड़ा बन जाता है, जो देर में भर पाता है। इसका कारण यह है कि दबाने से वहाँ का जल भाग दब कर अलग हो जाता है, जो फिर धीरे-धीरे आकर उस स्थान की पूर्ति करता है। ऐसी स्थिति में मण्डूर भस्म के प्रयोग से शरीर में रक्ताणुओं की वृद्धि होकर जल भाग शोषित कर हृदय की गति को नियमित करते हुए सूजन कम कर देती है और शारीरिक अवयवों को भी पुष्ट कर शरीर को नीरोग बना देती है।
✦ हारिद्रक रोग :यह प्रायः तरुण स्त्रियों को प्रसूतावस्था के बाद में होता है। इस अवस्था में मण्डूर भस्म अकेले या किसी उपयुक्त मिश्रण – जैसे अभ्रक, स्वर्णमाक्षिक, लौह, प्रवाल चन्द्रपुटी आदि भस्म के साथ मिलाकर देने से बहुत लाभ होता है।
✦ बालरोग : बच्चों के रोग में भी मण्डूर भस्म का प्रयोग बहुत गुणप्रद है।

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Weight 0.250 kg

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