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ताम्र भस्म क्या है ?

ताम्र भस्म “तांबे” से तैयार एक आयुर्वेदिक दवा है। इसका उपयोग उदर रोग, प्रमेह, अजीर्ण, विषमज्वर, सन्निपात, कफोदर, प्लीहोदर, यकृत् विकार, परिणामशूल, हिचकी, अफरा, अतिसार, संग्रहणी, पाण्डु, मांसार्बुद, गुल्म, कुष्ठ, कृमि रोग, हैजा, अम्लपित्त, प्लेग आदि के आयुर्वेदिक उपचार में किया जाता है। इन रोगों में ताम्र भस्म महौषधि है। अनेक रस-रसायन औषधे इसके योग से बनती हैं। यह अत्यन्त शक्तिवर्द्धक, रूचिकारक और कामोद्दीपक है।

ताम्र भस्म के फायदे ,गुण और उपयोग :

1-यकृत् में पथरी में : यकृत् में विकृति होने से पित्त का निर्माण बहुत कम होता है और कभी-कभी यकृत् में पथरी भी हो जाती है। इसके लिए ताम्र भरम बहुत उत्तम औषधि है। इसके सेवन से पित्त-विकृतिजन्य शूल शान्त होता है।
2-पित्ताशय में पथरी में : यकृत् और पित्ताशय पर इसका असर अधिक पड़ता है, यकृत बढ़ जाने से पित्ताशय संकुचित हो गया हो या पित्ताशय से पित्त गाढ़ा होने की वजह सवित न होता हो या पित्ताशय के किसी भाग में विकृति आ गयी हो इत्यादि अनेकों विकारों या इनमें से किसी एक के कारण पेट में दर्द होता हो या पित्ताशय में पथरी या यकृत् के कण जम जाने के कारण ही दर्द हो तो ताम्र भस्म २ रत्ती, कपर्दकभस्म २ रत्ती दोनों को एकत्र मिलाकर करेले के पत्तो के रस या घी और चीनी में मिलाकर देने से लाभ होता है।
3- गुल्म की गाँठ में : अष्ठीलर और गुल्म की गाँठ को गलाने के लिए तथा बढ़ी हुई प्लीहा को नष्ट करने के लिए ताम्र भस्म १ रत्ती, शंख भस्म २ रत्ती और मूलीक्षार ४ रत्ती मिलाकर कुमायसव के साथ देने से बहुत लाभ होता है। साथ-साथ यदि साधारण रेचक दवा की भी एकाध मात्रा दे दी जाय तो अच्छा है।
4-जलोदर में : जलोदर में सिर्फ ताम्र भस्म का ही प्रयोग न करें, क्योंकि यह मूत्रप्रवर्तक नहीं है, अतः इसके साथ फिटकरी भस्म ४ रत्ती, कुटकी चूर्ण २ माशे मिलाकर दें। ऊपर से पुनर्नवा और मकोय का स्वरस ५ तोला मिला देने से अच्छा लाभ होता है।
5-हैजा में – ताम्र भस्म चौथाई रत्ती, कर्पूर रस २ गोली प्याज के रस से या मयूर पुच्छ भस्म के साथ मधु मिलाकर आधे-आधे घंटे पर दें। जब वमन और दस्त कुछ कम होने लगे तो हृदय को ताकद देने वाली औषधियाँ भी दें।
6-अम्लपित्त में : अम्लपित्त की बढ़ी हुई अवस्था में ताम्र भस्म आधी रत्ती, सुवर्णमाक्षिक भस्म १ रत्ती में मिलाकर शहद से दें और अर से २ तोला मुनक्का और २ तोला हरड़ के छिलके को आधा सेर पानी में पकाकर एक-एक पाव शेष रहे तब छान कर यह क्वाथ पिला दें, इससे एक-दो साफ दस्त हो जायेंगे।
7-रक्त बढ़ाने में : शरीर में रक्त बढ़ाने के लिए आयुर्वेद में लौह भस्म का प्रयोग करना अच्छा लिखा है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने निश्चय किया है कि लौह में ताम्र का अंश रहता है, अतएव यह रक्त बढ़ाने में समर्थ है।
8-मन्दाग्नि में : मन्दाग्नि जन्य रोगों में लौह और ताम्र का मिश्रित प्रयोग करना चाहिए।
9-कफज प्रमेह में : कफज प्रमेह में कच्चे गूलर-फल के चूर्ण एक माशा के साथ, वातज प्रमेह में गुर्च सत्व ४ रती और मधु के साथ, अजीर्ण रोग में त्रिकटु १ माशा और मधु के साथ तथा कफ प्रधान सन्निपात में अदरख स्वरस और मधु के साथ ताम्र का प्रयोग महान लाभदायक है।
10-शूलों में : सब प्रकार के शूलों पर ताम्र भस्म १ रत्ती, शुद्ध गन्धक १रत्ती, इमली क्षार १ माशा मिलाकर गोघृत के साथ देना चाहिए। हिक्का में जम्बीरी नींबू रस के साथ ताम्र भस्म का प्रयोग अच्छा लाभ करता है।
11-हिचकी में : हिचकी में विषम भाग घृत और मधु से दें।
12-आमातिसार में : आमातिसार में बेलगिरी चूर्ण २माशा, पिप्पली चूर्ण ३ रत्ती को ताम्र भस्म १ रत्ती के साथ देना लाभदायक है।
13- पाण्डु रोग में : पाण्डु रोग में नवायस लौह मण्डूर भस्म के साथ, कृमि रोग में वायविडंग चूर्ण और सोमराजी (बाकुची) चूर्ण २ माशे के साथ १ रत्ती ताम्र भस्म का प्रयोग करना अच्छा है।
14-कुष्ठ रोग में : कुष्ठ रोग में बाकुची चूर्ण के साथ ताम्र भस्म का प्रयोग करना चाहिए।
15-यकृत् दाह में : यकृत् दाह में ताम्र भस्म १ रत्ती को गुर्च सत्त्व ४ रत्ती के साथ बेदाना अनार के रस या आमला मुरबा की चासनी के साथ दें। अम्लपित्त में कुष्माण्ड रस और मिश्री से दें।

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Weight 0.250 kg

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