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त्रिवंग भस्म के उपयोग और फायदे:-

1- मधुमेह में त्रिवंग भस्म के फायदे :
प्रमेह-विकार पर त्रिवंग भस्म का प्रभाव बहुत अच्छा होता है। विशेषकर मूत्रपिण्ड या मूत्रवाहिनी नली पर इसका असर होता है। अतः मधुमेह में भी इस भस्म का प्रयोग किया जाता है। यद्यपि मधुमेह में केवल नाग भस्म का ही प्रयोग बहुत लाभदायक है. किन्तु कुछ लक्षण विशेष होने पर जैसे-मधुमेह वालों की सन्धि स्थानों (जोडों) में पीड़ा (दर्द) होती हो, शिर तथा पेट में दर्द हो या पहले मन्दाग्नि होकर पेट फूल जाता हो, बाद में क्रमश: मधुमेह रोग उत्पन्न हो गया हो. ऐसी अवस्था में त्रिवंग भस्म बहुत लाभ करती है।
2-प्रमेह पिड़िकायें में त्रिवंग भस्म के फायदे :
इसके अतिरिक्त जिस मधुमेह रोगी को मधुमेह बहुत पुराना होकर प्रमेह पिड़िकायें (शरीर में फोड़े-फुसियाँ) निकलती हों, उसके लिये भी त्रिवंग भस्म बहुत हितकर है।
3- वीर्य विकार दूर करने में त्रिवंग भस्म के फायदे :
यह भस्म वीर्यवर्द्धक भी है। अतः जननेन्द्रिय की शिथिल नसों को सख्त कर देती है. जिससे वीर्य का स्वयं (अपने आप) साव हो जाना तथा स्वप्नावस्था या स्त्री-प्रसंग की इच्छा होते ही अथवा स्त्री-प्रसंग से पूर्व ही जो वीर्यस्राव हो जाता है, वह रुक जाता है। इसके सेवन से जननेन्द्रिय की मांसपेशियाँ और नसें कड़ी हो जाती, साथ ही शुक्र भी गाढ़ा हो जाता है। अतः वीर्य विकार के लिये यह भस्म बहुत उपयोगी है।
4-गर्भाशय में त्रिवंग भस्म के फायदे :
छोटी आयु (वय) में मासिक धर्म होना या १४ से २० वर्ष तक की आयु में पुरुष का समागम ज्यादा होना, इससे गर्भधारणा शक्ति कमजोर हो जाती है, अतएव गर्भ नहीं रहता और रहता भी है तो असमय में ही (गर्भ की पुष्टि न होकर) हीनांग या अल्पायु अथवा रोगी सन्तान उत्पन्न होती है। साथ ही जच्चा (प्रसूता) को भी अत्यन्त कष्ट भोगना पड़ता है। बहुत-सी स्त्रियां तो ज्वरादि से पिड़ित हो क्रमशः तपेदिक की भी शिकार हो जाती हैं, जिससे छुटकारा पाना कठिन ही नहीं असम्भव हो जाता है। ऐसी हालत में गर्भाशय को शक्ति प्रदान करने के लिए, स्त्रियों की कमजोरी दूर करने के लिए, त्रिवंग भस्म का प्रयोग करना उत्तम है।
5- श्वेतप्रदर में त्रिवंग भस्म के फायदे :
यह रोग आजकल स्त्री समाज में विशेष कर नयी शिक्षा से शिक्षित स्त्रीसमाज में विशेष देखने में आता है। इसका सबसे मुख्य कारण आधुनिक बनावटी फैशन, सिनेमा, थिएटर, उपन्यास, नग्न चित्रादि देखने-पढने तथा मनन करने से काम-वासना की प्रवृत्ति सीमा से अधिक हो जाती है। परिणाम यह होता है कि सफेद पानी चिपचिपा-सा जननेन्द्रिय के मुंह द्वारा निकलता प्रारम्भ हो जाता है। कभी-कभी यह श्राव इतना बढ़ जाता है कि स्त्रियाँ इनके मारे परेशान हो जाती है। साथ ही कमजोरी बढ़ने लगती है, भूख कम हो जाती है, चक्कर आने लगता है। इस अवस्था में त्रिवंग भस्म सेवन करना हितकर है।
6-बीसों प्रकार के प्रमेह पर शुद्ध शिलाजीत और मधु में मिलाकर त्रिवंग भस्म १ रत्ती की मात्रा में सेवन करना अति लाभप्रद है।
7-धातुक्षीणता आदि कारणों से ही शुक्र स्थान इतने कमजोर हो जाते हैं कि विषय भोगादि के चिन्तन मात्र से ही शुक्र साव हो जाता है ऐसी अवस्था में त्रिवंग भस्म १ रत्ती से २ रत्ती की मात्रा में प्रवाल पिष्टी १ रत्ती में मिलाकर मधु और ताजे आँवले के स्वरस में मिलाकर देने से लाभ होता है।
8-बार-बार गर्भस्राव या गर्भाशय की कमजोरी अथवा गर्भधारण- शक्ति नष्ट होने पर त्रिवंग भस्म १ रत्ती, मुक्तापिष्टी १ रत्ती च्यवनप्राश १ तोला में मिलाकर गोदुग्ध के साथ सेवन कराना परमोत्कृष्ट है।
9-मधुमेह में जामुन की गुठली या गुड़मार बूटी के चूर्ण २ माशे के साथ त्रिवंग भस्म १ रत्ती की मात्रा में मधु के साथ देना लाभप्रद है।
10- नपुंसकता में मक्खन या मलाई के साथ १ रत्ती त्रिवंग भस्म देना अच्छा है। श्वेतप्रदर में त्रिवंग भस्म १ रत्ती, चावल के धोवन के साथ मृगश्रृंग भस्म २ रत्ती में मिलाकर देना उत्तम है।

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